मोहम्मद बिन जायद स्पेसीज कंजर्वेशन फंड से पक्षी संरक्षण के लिए अधिक सहायता 

अबू धाबी, 4 जनवरी, 2018 (डब्ल्यूएएम) -- मोहम्मद बिन जायद स्पेसीज कंजर्वेशन फंड की तरफ से दो पक्षी प्रजातियों पर अनुसंधान और संरक्षण परियोजनाओं के लिए अधिक सहायता दी जाएगी। इन दो पक्षी प्रजातियों में एक विलुप्तप्राय है और दूसरी की संख्या 50 से भी कम है। पहला, जेर्डन कौरसर (राइनोप्टिलस बिटोरक्वाटस) को पहली बार एक ब्रिटिश सर्जन थॉमस जेरडोन ने भारत के ईस्टर्न घाट में 1848 में दर्ज किया था। यह स्थान अब आंध्र प्रदेश में है। इस पक्षी को 1900 तक के शुरुआती दशकों में कभी-कभी देखा गया। बाद के दिनों में विलुप्त इस पक्षी को बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और यूएस फिश एंड वाइल्डलाइफ सर्विस ने 1986 में एक वन्यजीव अभयारण्य के रूप में नामित क्षेत्र में फिर से खोजा गया था। इसके बाद इसे वर्ष 2009 तक कई बार देखा गया। हालांकि, 2010 और 2015 के बीच लगातार खोजे जाने के बावजूद इस पक्षी को नहीं गया देखा गया है। यह दुनिया में सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक है। जेर्डन कौरसर को IUCN द्वारा गंभीर रूप से लुप्तप्राय के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, जिसका अर्थ है कि यह विलुप्त होने का सबसे अधिक जोखिम का सामना कर रहा है। ईंधन के लिए लकड़ी संग्रह, पशुधन चराई, कृषि की वजह से इनका पसंदीदा निवास स्थान तेजी से खत्म हो रह है। माना जाता है कि इनमें से 50 ही जीवित हैं। एक स्पेसीज रिकवरी प्लान विकसित किया है, जिसमें अनुसंधान, निगरानी, संरक्षण शिक्षा और आवास प्रबंधन शामिल है ताकि इसका दीर्घकालिक अस्तित्व सुनिश्चित किया जा सके। वर्तमान शोध का प्रबंधन और संचालन डार्विन इनिशिएटिव और आंध्र प्रदेश वन विभाग द्वारा समर्थित, बर्ड्स नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी, द्वारा ब्रिटेन के रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स और रीडिंग एंड कैम्ब्रिज के तत्वावधान में किया जा रहा है। एक अन्य पक्षी बरमूडा पेट्रेल या काहो (पेत्रोड्रोमा कहो) जिसे विलुप्त माना जाता था, के लिए चल रहे शोध को भी फंड से सहायता मिल रही है। माना जा रहा है 15वीं शताब्दी के अंत में यूरोपीय जहाजों के आगमन से पहले यहां इस प्रजाति के पक्षी बहुतायत में थे और करीब 5 लाख से अधिक घोंसले थे। हालांकि, बाद के दिनों में चूहों, बिल्लियों, सूअरों व कुत्तों व इनके प्राकृतिक आवास के विनाश की वजह से इन संख्या में बड़ी गिरावट देखी गई। महज कुछ ही सालों में यानी 1620 तक ये लगभग विलुप्तप्राय हो गए। बाद में 1906 तक इन्हें नहीं देखा जा सका। 1935 व 1941 में एक जोड़े को देखा गया। बाद में 1951 में इस प्रजाति के 18 जोड़ों का पता लगा। तब से चलाए जा रहे एक गहन संरक्षण कार्यक्रम, जिसमें अपतटीय आइलेट्स से चूहों का उन्मूलन शामिल है, के बाद लगभग 115 प्रजनन जोड़े की संख्या में वृद्धि देखी गई है। ओसन्स एंड आइलैन्ड्स फॉर द कन्जर्वेशन ऑर्गेनाइजेशन अमेरिकन बर्ड कंजर्वेन्सी, जो रमूडा पेट्रेल की रक्षा के लिए सक्रिय रूप काम कर रही है, के उपाध्यक्ष डॉ. जॉर्ज वालेस के अनुसार "यह अद्भुत सफलता की एक कहानी है जिसमें समान प्रकार के मुद्दे शामिल हैं। कई द्वीप स्थानों में देखें जब शिकारियों और / या चरने वाले जानवरों की नई प्रजातियां नाजुक रूप से संतुलित द्वीप पारिस्थितिकी प्रणालियों को बदल दते हैं। शिकार का प्रभाव इनके निवास स्थान के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है और दुनिया भर में विलुप्त होने वाले अनगिनत प्रजातियों का कारण बना है। इन खतरों को कैसे दूर किया जा सकता है, काहो रिकवरी प्रोजेक्ट इसका एक शानदार उदाहरण है।"

एक तीसरी प्रजाति, फाटू हाइव मोनार्क (पोमेरिया वाइटनी) एक बड़ी फ्लाईकैचर है, जो दक्षिण प्रशांत में फ्रेंच पोलिनेशिया के मारीकास द्वीप तक सीमित है। यह प्रजाति 2300 फीट की ऊंचाई पर घने जंगलों रहती है। फरवरी 2000 में इसकी कुल आबादी कुछ सौ होने का अनुमान था, लेकिन 2011 तक इसकी संख्या 50 से भी कम हो गई। ऐसा संभवतः द्वीप पर 2000 में चूहों के आगमन की वजह से हुआ। चूहों को खत्म करने के लिए चलाए जा रहे एक गहन कार्यक्रम की वजह से हाइव मोनार्क की आबादी अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी है। हालांकि, यह अब भी दुनिया में पक्षियों की सबसे लुप्तप्राय प्रजातियों में से एक बनी हुई है। अपने नवीनतम अनुदानों में, मोहम्मद बिन जायद स्पेसीज कंजर्वेशन फंड एक अन्य पेट्रेल प्रजाति के ब्लैक-कैप्ड पेट्रेल, (पेत्रोड्रोमे हसीटा), बरमूडा पेट्रेल की करीबी प्रजाति के संरक्षण के लिए हैती, कैरिबियन इलाके के डोमिनिकन रिपब्लिक व डोमिनिका द्वीप में समर्पित परियोजना की भी सहायता कर रहा है। समुद्र में पक्षियों की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए उपग्रह-टैगिंग के लिए धन दिया जा रहा है। तंजानिया में अफ्रीकी सफेद पीठ वाले गिद्ध, (जिप्स अफ्रीकेनस) के संरक्षण पर काम के लिए भी सहायता दी जा रही है। यह अफ्रीका के सबसे आम गिद्धों में से एक था, हालांकि अब इसे IUCN द्वारा लुप्तप्राय के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 2008 में अबू धाबी के क्राउन प्रिंस और यूएई सशस्त्र बलों के उप सुप्रीम कमांडर हिज हाइनेस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान के निर्देश में स्थापित मोहम्मद बिन जायद स्पेसीज कंजर्वेशन फंड ने अब तक 1,200 से अधिक प्रजातियों और पौधों और जानवरों की उप-प्रजातियों के संरक्षण के लिए चलाए जा रहे 1,924 संरक्षण परियोजनाओं को 18 मिलियन डॉलर की राशि प्रदान की है। अनुवादः एस कुमार http://wam.ae/en/details/1395302730494

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